धम्मपद – यमकवग्गो # 13

यथागारं दुच्छन्नं वुट्ठी समतिविज्झति । एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति ॥ १३॥ हिन्दी अर्थ यदि घर की छत ठीक न हो, तो जिस प्रकार उसमें वर्षा का प्रवेश हो जाता है, उसी प्रकार यदि (संयम का) अभ्यास न हो, तो मन में राग प्रविष्ट हो जाता है।

धम्मपद – यमकवग्गो # 12

सारञ्च सारतो ञत्वा असारञ्च असारतो। ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासङ्कप्पगोचरा ॥१२॥ हिन्दी अर्थ सार (वस्तु) को सार और असार (वस्तु) को असार समझने वाले, सच्चे संकल्पों में संलग्न मनुष्य सार (वस्तु) को प्राप्त करते हैं ।

बूढ़े गिद्ध की सीख | प्रेरणादायक हिंदी कहानी

एक घने जंगल में गिद्धों का एक झुण्ड रहता था। गिद्ध झुण्ड बनाकर लम्बी उड़ान भरते और शिकार की तलाश किया करते थे। एक बार गिद्धों का झुण्ड उड़ते उड़ते एक ऐसे टापू पर पहुँच गया जहां पर बहुत ज्यादा मछली और मेंढक थे। इस टापू पर गिद्धों को रहने के लिए सारी सुविधाएँ मौजूद … Read more

धम्मपद – यमकवग्गो # 11

असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनो । ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासङ्कप्पगोचरा ॥११॥ हिन्दी अर्थ असार (वस्तु) को सार और सार (वस्तु) को असार समझने वाले, झूठे संकल्पों में संलग्न मनुष्य सार (वस्तु) को नहीं प्राप्त करते ।

धम्मपद – यमकवग्गो # 10

यो च वन्तकसावस्स सीलेसु सुसमाहितो। उपेतो दमसच्चेन स वे कासावमरहित ।।१०।। हिन्दी अर्थ जिसने अपने मन के मैल को दूर कर दिया है, जो सदाचारी है, सत्य और संयम से युक्त वह व्यक्ति ही काषाय-वस्त्र का अधिकारी है ।

धम्मपद – यमकवग्गो # 9

अनिक्कसावो कासावं यो वस्थं परिदहेस्सति । अपेतो दमसच्चेन न सो कासावमरहति ।।९। हिन्दी अर्थ जो अपने मन को स्वच्छ किए बिना काषाय-वस्त्र को धारण करता है, सत्य और संयम से रहित वह व्यक्ति काषाय-वस्त्र का अधिकारी नहीं है।

उपोसथ क्या हैं उसे कैसे सम्पन्न करें ?

upsatha

बुद्ध पूर्व वैदिक काल से ही भारतीय समाज में उपवास रखने की परम्परा शुरू हैं। परंतु वह उपवास अंधविश्वास व मिथ्यादृष्टि पर आधारित होता था। सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए काल्पनिक देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए, उनेका तथाकथित आर्शिवाद प्राप्त करने के लिए और काल्पनिक स्वर्ग की प्राप्ति के उद्देश्य से ही उपवास … Read more

धम्मपद – यमकवग्गो – 8

असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवुतं । भोजनम्हि च मत्तञ्ञुं कुसीतं सद्धं आरद्धवीरियं। तं वे नप्पसहति मारो वातो सेलं’व पब्बतं ।।८।॥ हिंदी अर्थ जो काम-भोग के जीवन में रत नहीं है, जिसकी इन्द्रियाँ उसके काबू में हैं, जिसे भोजन की उचित मात्रा का ज्ञान है, जो श्रद्धावान् तथा उद्योगी है, उसे मार वैसे ही नहीं हिला सकता, … Read more